HOUSE KEEPING PRACTICAL NIOS 12th
गृह व्यवस्था का महत्व
रोहन की कमर में दर्द है क्योंकि उसके गद्दे में गाँठ है। उसे ट्रेन से कहीं जाना है। अत: वह नहाने के लिये नल खोलता है परंतु उसमें पानी नहीं आ रहा है। वह छत पर टैंक में पानी देखने के लिये जाता है तो पता चलता है कि पाइप में छेद से सारा पानी निकल चुका है क्या आप रोहन की जगह होना चाहेंगे? क्या आप कभी गंदे शौचालय का प्रयोग करना चाहेंगे या गंदे व फटे पुराने कपड़े पहनना चाहेंगे? क्या आप किसी मैले स्थान पर कार्य करना चाहेंगे? यदि आप खाना खाने बाहर जा रहे हों तो क्या आप किसी ऐसे रेस्तरां में जाना चाहेंगे जहाँ कुर्सी मेज टूटे हों और जहाँ चारों ओर कीड़े मकोड़े रेंग रहे हों? क्या आप गंदे और उबड़ खाबड़ बिस्तर पर सोना पसंद करेंगे? अवश्य ही आपका हर जवाब ‘ना’ में ही होगा। ये बहुत छोटी-छोटी चीजें हैं परंतु आपके दैनिक जीवन में इनसे काफी फर्क पड़ता है।गृह व्यवस्था के क्षेत्र
अब तक आप समझ ही चुके होंगे कि अपने घर के लिये अच्छी गृह व्यवस्था कितनी महत्त्वपूर्ण है। उसी प्रकार यह किसी भी अन्य प्रतिष्ठान के लिये भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह कोई दुकान हो, व्यापार केन्द्र, ऑफिस, क्लब, अतिथिगृह, अस्पताल, होटल या फिर कोई छात्रावास। जिन प्रतिष्ठानों का जिक्र किया गया है उनके प्रत्येक क्षेत्र को स्वच्छ व व्यवस्थित रखा जाना चाहिये व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में गृह व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र के अनुरूप प्रशिक्षित लोगों के एक दल द्वारा की जाती है। नीचे, भवन के क्षेत्रों की एक विस्तृत सूची दी जा रही है जहाँ पर गृह व्यवस्था की आवश्यकता होती है। यदि चाहें तो आप इस सूची में कुछ अन्य को भी जोड़ सकते हैं।Question 3: वस्त्रों की धुलाई से आप क्या समझते हैं? वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता भी स्पष्ट कीजिए।
ANSWER
वस्त्रों की धुलाई का अर्थ सभ्य मनुष्य के जीवन में वस्त्रों का अत्यन्त महत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति समय-समय पर जो वस्त्र धारण करता है, उन वस्त्रों से जहाँ एक ओर उसके शरीर को विभिन्न प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होती है, वहीं दूसरी ओर वे वस्त्र व्यक्ति के व्यक्तित्व को (UPBoardSolutions.com) निखारने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल साफ-सुथरे तथा धुले हुए वस्त्र ही उत्तम माने जाते हैं।
नियमित रूप से धारण किए जाने वाले तथा घर पर अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्र शीघ्र ही गन्दे एवं मैले हो जाते हैं। वस्त्रों के गन्दे एवं मैले होने में जहाँ बाहरी धूल-मिट्टी एवं गन्दगी की विशेष भूमिका होती है, वहीं वस्त्रों को धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले पसीने का भी विशेष प्रभाव होता है। पसीने से गीले हुए वस्त्रों में बाहरी धूल-मिट्टी जम जाती है। यही नहीं पसीना वस्त्रों में ही सूखकर उन्हें दुर्गन्धयुक्त भी बनाता है। इस प्रकार विभिन्न कारणों से गन्दे एवं मैले हुए वस्त्रों को पुनः गन्दगी एवं दुर्गन्धरहित साफ-सुथरा बनाने की प्रक्रिया को ही वस्त्रों की धुलाई कहते हैं। वस्त्रों की धुलाई के अन्तर्गत विभिन्न साधनों एवं उपायों द्वारा वस्त्रों की मैल, गन्दगी, दुर्गन्ध
आदि को समाप्त किया जाता है तथा पुनः वस्त्रों को साफ-सुथरा बनाया जाता है। वस्त्रों की धुलाई के लिए जल तथा शोधक पदार्थ (साबुन, डिटर्जेण्ट आदि) आवश्यक होते हैं तथा इसके लिए वस्त्रों को मलना, रगड़ना, पीटना एवं खंगालना आदि आवश्यक उपाय होते है
वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता
प्रश्न उठता है कि वस्त्रों को धुलाई की आवश्यकता क्यों होती है? या यह कहा जाए कि वस्त्रों की धुलाई का उद्देश्य क्या होता है? इस विषय में निम्नलिखित तथ्यों को जानना अभीष्ट होगा
(1) वस्त्रों की सफाई के लिए:
शरीर की नियमित सफाई जिस प्रकार अति आवश्यक होती है, ठीक उसी प्रकार शरीर पर धारण करने वाले तथा अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्रों की भी नियमित सफाई आवश्यक होती है। शारीरिक सफाई के लिए स्नान आवश्यक होता है तथा की सफाई के लिए वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना
2) वस्त्रों की दुर्गन्ध समाप्त करने के लिए:
कपड़ों को पहनने, बिछाने तथा ओढ़ने आदि के दौरान शरीर से निकलने वाला पसीना उनमें व्याप्त हो जाता है। इस पसीने से वस्त्रों में दुर्गन्ध आ जाती है। इस दुर्गन्ध को समाप्त करने के लिए भी वस्त्रों की धुलाई आवश्यक हो जाती है।
(3) कपड़ों की सुरक्षा के लिए:
कपड़ों की सुरक्षा के लिए भी इनकी नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है। गन्दे एवं मैले वस्त्रों को विभिन्न प्रकार के कीड़ों, फफूदी तथा बैक्टीरिया आदि द्वारा नष्ट कर देने की आशंका बनी रहती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए वस्त्रों की सुरक्षा के लिए भी वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।
(4) व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए:
मैले एवं गन्दे वस्त्र व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। मैले एवं गन्दे वस्त्र निरन्तर धारण किए रहने की स्थिति में विभिन्न चर्म रोग हो जाने की आशंका रहती है। यही नहीं गन्दे वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव (UPBoardSolutions.com) पड़ सकता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः हीन-भावना का शिकार हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्तिगत, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को रम्नाए रखने के लिए भी वस्त्रों की नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है।
5) कपड़ों की सुन्दरता के लिए:
गन्दे एवं मैले वस्त्र भद्दे एवं बुरे लगते हैं। वस्त्रों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने के लिए उनकी नियमित धुलाई आवश्यक होती है।
(6) व्यक्तित्व के निखार के लिए:
नि:सन्देह कहा जा सकता है कि साफ-सुथरे एवं धुले हुए तथा अच्छी तरह से प्रेस किए हुए वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भी वस्त्रों
2. बाह्य कारक-अपर्याप्त आहार, रोग डत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीव, पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले प्रदूषक पदार्थ बाह्य कारक हैं जो हमारे शरीर के कार्यों में हस्तक्षेप करके हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं इनका उपचार पूर्ण भौजन, स्वच्छ पर्यावरण तथा ऐसी सामाजिक परंपराएं जो अच्छी और ठीक आदतों को बढ़ावा देती हैं। आपातकालीन विपत्तियां जैसे लू लगना, ठंड में तुषार, उपघात आदि भी बाह्य कारकों में ही आती हैं।
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक-
(a) पोषण-कुपोषण से अनेक रोग जन्म लेते हैं तथा कुपोषण ग़रीबी का परिणाम है। पोषण से ही मानव शरीर को प्रतिरक्षण प्राप्त होता है जो रोगों से लड़ने क्षमता प्रदान करता है। आवशस्यकता से अधिक आहार लेने पर मोटापा हो जाता है जो आगे कई रोगों का कारण बनता है। नियंत्रित भोजन, व्यायाम तथा चिकित्सा से इस रोग का निवारण किया जा सकता है। हमारा भोजन सरल, स्वच्छ तथा संतुलित होना चाहिए।
(b) सूक्ष्म जीवों दवारा संक्रमण-सूक्ष्म जीव संक्रमण का प्रमुख कारण है। सूक्ष्म जीव हमारे शरीर में सांस दुवारा, भोजन और पानी दुबारा, त्वचीय स्पर्श के दुवारा या घाव तथा मच्छर-मक्खी आदि वाहकों के द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं। कुछ सूक्ष्म जीवों का संक्रमण सरलता से हो जाता है। कुछ का प्रभाव लंबे समय के पश्चात् पता चलता है जीवाणु, फंगस, विषाणु तथा प्रोटोजोआ ऐसे सूक्ष्म जीव हैं जिनका संक्रमण घातक होता है। इनके संक्रमण से न्यूमोनिया, टिटनेस, क्षव रोग, कुष्ठ रोग, हैजा, चर्म रोग, चेचक, खसरा, कैंसर, एड्स, रेबीज, डेंगू. मलेरिया, काला ज्वर, पेचिश, गिआर्डियता तथा विषाक्त भोजन जैसे रोग होते हैं। सूक्ष्म जीबों दुवारा संक्रमण से बचने का सामान्य उपाय है वातावरण को स्वच्छ बनाए रखना तथा इन रोगों से लड़ने के लिए शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षी व्यवस्था को बनाए रखना।
- प्राथमिक उपचार में आवश्यक बातें
- प्राथमिक उपचारक को आवश्यकतानुसार रोगनिदान करना चाहिए, तथा
- घायल को कितनी, कैसी और कहाँ तक सहायता दी जाए, इसपर विचार करना चाहिए।
- रोग या घाव संबंधी आवश्यक बातें
- रोगी की स्थिति, इसमें रोगी की दशा और स्थिति देखनी चाहिए।
- चिन्ह, लक्षण या वृत्तांत, अर्थात् घायल के शरीरगत चिन्ह, जैसे सूजन, कुरूपता, रक्तसंचय इतयादि प्राथमिक उपचारक को अपनी ज्ञानेंद्रियों से पहचानना तथा लक्षण, जैसे पीड़ा, जड़ता, घुमरी, प्यास इत्यादि, पर ध्यान देना चाहिए। यदि घायल व्यक्ति होश में हो तो रोग का और वृत्तांत उससे, या आसपास के लोगों से, पूछना चाहिए। रोगके वृत्तांत के साथ लक्षणों पर विचार करने पर निदान में बड़ी सहायता मिलती है।
- कारण : यदि कारण का बोध हो जाए तो उसके फल का बहुत कुछ बोध हो सकता है, परंतु स्मरण रहे कि एक कारण से दो स्थानों पर चोट, अर्थात् दो फल हो सकते हैं, अथवा एक कारण से या तो स्पष्ट फल हो, या कोई दूसरा फल, जिसका संबंध उस कारण से न हो, हो सकता है। कभी कभी कारण बाद तक अपना काम करता रहता है, जैसे गले में फंदा इत्यादि।
- घटनास्थल से संबंधित बातें -
- खतरे का मूल कारण, आग, बिजली का तार, विषैली गैस, केले का छिलका या बिगड़ा घोड़ा इत्यादि हो सकते हैं, जिसका ज्ञान प्राथमिक उपचारक को प्राप्त करना चाहिए।
- निदान में सहायक बातें, जैसे रक्त के धब्बे, टूटी सीढ़ी, बोतलें तथा ऐसी वस्तुओं को, जिनसे घायल की चोट या रोग से संबंध हो सुरक्षित रखना चाहिए।
- घटनास्थल पर उपलब्ध वस्तुओं का यथोचित उपयोग करना श्रेयस्कर है।
- दोहर, कंबल, छाते इत्यादि से बीमार की धूप या बरसात से रक्षा करनी चाहिए।
- बीमार को ले जाने के निमित्त प्राथमिक उपचारक को देखना चाहिए कि घटनास्थान पर क्या क्या वस्तुएँ मिल सकती हैं। छाया का स्थान कितनी दूर है, मार्ग की दशा क्या है। रोगी को ले जाने के लिए प्राप्त योग्य सहायता का श्रेष्ठ उपयोग तथा रोगी की पूरी देखभाल करनी चाहिए।
- प्राथमिक उपचार करनेवाले व्यक्ति के गुण
- (१) विवेकी (observant), जिससे वह दुर्घटना के चिन्ह पहचान सके;
- (२) व्यवहारकुशल (tactful), जिससे घटना संबंधी जानकारी जल्द से जल्द प्राप्त करते हुए वह रोगी का विश्वास प्राप्त करे;
- (३) युक्तिपूर्ण (resourceful), जिससे वह निकटतम साधनों का उपयोग कर प्रकृति का सहायक बने;
- (४) निपुण (dexterous), जिससे वह ऐसे उपायों को काम में लाए कि रोगी को उठाने इत्यादि में कष्ट न हो;
- (५) स्पष्टवक्ता (explicit), जिससे वह लोगों की सहायता में ठीक अगुवाई कर सके;
- (६) विवेचक (discriminator), जिससे गंभीर एवं घातक चोटों को पहचान कर उनका उपचार पहले करे;
- (७) अध्यवसायी (persevering), जिससे तत्काल सफलता न मिलने पर भी निराश न हो तथा
- (८) सहानुभूतियुक्त (sympathetic), जिससे रोगी को ढाढ़स दे सके, होना चाहिए।
घरेलू बजट का क्या महत्व है परिवार के लिए बजट समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिय।
समझकर कर सकता है क्योंकि धन एक सिमित साधन है तथा यह प्रशास करता है की अपनी सिमित आय द्वारा अपने परिवार की समस्त आवश्यकताओं को पूर्ण करके भविष्य हेतु कुछ न कुछ बचत के सकें। यही कारण है की गृहस्वामी तथा गृहस्वामिनी सोच समझ करके अपने परिवार की आय का उचित व्यय करने हेतु लिखित एवं मौखिक योजना बनाते हगैं और उस योजना को क्रियान्वित करने के लिए उन्हें अपने व्यय का पूरा हिसाब किताब रखना पड़ता है, कोई भी परिवार घरेलु बचत बनाकर ही व्यय को नियत्रित कर सकता है।
- घरेलु बचत के निम्नलिखित लाभ हैं :
- घरेलु हिसाब किताब प्रतिदिन लिखने से हमें यह ज्ञात रहता है की हमारे पास कितना पैसा शेष बचा है जो परिवार की आवश्यकतों की पूर्ति हेतु अत्यन्त आवश्यक है जिससे -पारिवारिक लक्ष्य की प्राप्ति जो सके।
- घरेलु किताब रखने से अधिक व्यय पर अंकुश रहता है। विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एक सामान्य दिशा निर्देश का आभास होता है।
- असीमित आवश्यकतओं और सिमित आय के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है।
- सही ढ़ग से व्यय करने के फलस्वरूप बचत व णिव्वेष को प्रोत्साहन मिलता है।
- इससे परिवार का भविष्य सुरक्षित रहता है।
- परिवार के लिए वजट बनते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना चाहिए।
- आय और व्यय के बीच ज्यादा फासला न हो अर्थात आय की तुलना में व्यय बहुत अधिक नहीं हो।
- बजट से जीवन लक्ष्यों की पूर्ति हो यानी परिवार को उच्च जीवन स्तर की औ प्रेरित कर सकें।
- बजट बनाते समय अनिवार्य आवश्यकतओं को ध्यान में रखना चाहिए।
- सुरक्षति भविष्य का ध्यान माइए रखकर बजट बनानी चाहिए ताकि आकस्मिक खर्चों यथा बिमारी, दुर्घटना तथा विवाह आदि के लिए धन की आवश्यकत की पूर्ति समय पर हो सके।
- व्यव को आए के साथ समायोजित होना चाहिए ताकि ऋण का सहारा न लेना पड़े।
- बजट बनते समय महंगाई को भी ध्यान माइए रखना चाहिए।

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