HOUSE KEEPING PRACTICAL NIOS 12th

1.QUESTION
गृह व्यवस्था का क्या अर्थ है इसका महत्व और कार्य बताएं?
ANSWER :
साधारण शब्दों में गृह व्यवस्था का अर्थ है घर का रखरखाव या घर को सुचारू रूप से चलाने के लिये इसकी स्वच्छता, उचित रखरखाव व व्यवस्था की देख-रेख। जब आप अपने घर को स्वच्छ और व्यवस्थित रखते हैं तब आप इसे अधिक से अधिक सुंदर भी रखना चाहते हैं। 
आप यह कैसे सुनिश्चित करें कि घर में प्रत्येक वस्तु प्रयोग करने योग्य स्थिति में है, कोई भी वस्तु टुटी फूटी अवस्था में नहीं है और कपड़े फटे पुराने नहीं हैं? सभी नल, गीज़र, बिजली की तार, बल्ब, ट्यूब, पंखे, प्लग आदि भली भाँति कार्य कर रहे हों और शॉर्ट सर्किट के कारण आग आदि लगने का भय न हो, इत्यादि। 
अत: घर की प्रत्येक वस्तु को ठीक और व्यवस्थित रखने की भिन्न-भिन्न प्रक्रियायों को सामूहिक रूप से अच्छी गृह व्यवस्था कहते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि गृह व्यवस्था किसी स्थान को स्वच्छ, सुन्दर और व्यवस्थित रखने की प्रक्रिया है ताकि यह प्रसन्नता दायक दिखे और सभी को आमिन्त्रात करता हुआ लगे चाहे वह व्यक्ति उस स्थान पर रह रहा हो, मिलने के लिए आया हो या फिर कार्य कर रहा हो।

गृह व्यवस्था का महत्व

रोहन की कमर में दर्द है क्योंकि उसके गद्दे में गाँठ है। उसे ट्रेन से कहीं जाना है। अत: वह नहाने के लिये नल खोलता है परंतु उसमें पानी नहीं आ रहा है। वह छत पर टैंक में पानी देखने के लिये जाता है तो पता चलता है कि पाइप में छेद से सारा पानी निकल चुका है क्या आप रोहन की जगह होना चाहेंगे? क्या आप कभी गंदे शौचालय का प्रयोग करना चाहेंगे या गंदे व फटे पुराने कपड़े पहनना चाहेंगे? क्या आप किसी मैले स्थान पर कार्य करना चाहेंगे? यदि आप खाना खाने बाहर जा रहे हों तो क्या आप किसी ऐसे रेस्तरां में जाना चाहेंगे जहाँ कुर्सी मेज टूटे हों और जहाँ चारों ओर कीड़े मकोड़े रेंग रहे हों? क्या आप गंदे और उबड़ खाबड़ बिस्तर पर सोना पसंद करेंगे? अवश्य ही आपका हर जवाब ‘ना’ में ही होगा। ये बहुत छोटी-छोटी चीजें हैं परंतु आपके दैनिक जीवन में इनसे काफी फर्क पड़ता है। 

ये छोटी-छोटी चीजें ही अच्छी गृह व्यवस्था का सार हैं। यदि रोहन समय रहते ही टपकते नल को ठीक करवा लेता, खाने की कुर्सी की मरम्मत उसी समय करवा लेता जब यह टूटनी शुरू हुयी थी, या नाली जब रूकनी शुरू हुयी थी, तभी उसकी सफाई करवा लेता, अपने घर में नियमित रूप से कीड़े मकौड़े के लिये छिड़काव करवा लेता-तब अवश्य ही उसके घर का वातावरण स्वच्छ व आरामदेह होता, जिसमें रोहन अत्यंत प्रसन्न व शांत रहता। उसे जरा भी परेशानी, अवसाद व निराशा नहीं अनुभव होती या उसे हीन भावना का शिकार नहीं होना पड़ता। अच्छी गृहव्यवस्था सभी उपकरणों की सुचारू कार्य प्रणाली को सुनिश्चित करती, न कहीं पानी टपकता, एक आरामदेह वातावरण होता जिसमें रोहन परेशानी रहित जीवन जीता। अत: गृहव्यवस्था का अर्थ है छोटे छोटे कार्यों को समय रहते ही निपटा लेना।

गृह व्यवस्था के क्षेत्र

अब तक आप समझ ही चुके होंगे कि अपने घर के लिये अच्छी गृह व्यवस्था कितनी महत्त्वपूर्ण है। उसी प्रकार यह किसी भी अन्य प्रतिष्ठान के लिये भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह कोई दुकान हो, व्यापार केन्द्र, ऑफिस, क्लब, अतिथिगृह, अस्पताल, होटल या फिर कोई छात्रावास। जिन प्रतिष्ठानों का जिक्र किया गया है उनके प्रत्येक क्षेत्र को स्वच्छ व व्यवस्थित रखा जाना चाहिये व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में गृह व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र के अनुरूप प्रशिक्षित लोगों के एक दल द्वारा की जाती है। नीचे, भवन के क्षेत्रों की एक विस्तृत सूची दी जा रही है जहाँ पर गृह व्यवस्था की आवश्यकता होती है। यदि चाहें तो आप इस सूची में कुछ अन्य को भी जोड़ सकते हैं।
1. कमरे और गलियारे - छत और दीवारों का रंग, वॉल पेपर, पंखे, एयर कंडीशनर, बिजली के स्विच और सॉकेट, बिजनी की वायरिंग, खिड़कियां, दरवाजे, काँच, बिस्तरे, कालीन, ताले, चाबी आदि।
2. शौचालय - नल, सिंक, शौचालय, गीज़र, जल आपूर्ति, बिजली के सॉकेट और स्विच, तौलिये, टॉयलेट पेपर, साबुन, शैम्पू इत्यादि।
3. लिनन - लिनन (टेबल नैपकिन, टेबल क्लॉथ, साइलेंस क्लॉथ, तौलिए, चादर बैड कवर, कम्बल, मेहमानों के कपड़े, कर्मचारियों की वर्दियाँ, आदि।)
4. फर्नीचर और फर्निशिंग - फर्नीचर, पर्दे, टेबल लैम्प, ट्यूब लाइट, झाड़ फानूस, बल्ब, सोफा, डायनिंग टेबल और कुर्सियां, आदि।
5. बगीचा - पौधे, गमले, लॉन की घास, फूल, पेड़, झाड़ियां, बाड़ आदि।
6. सार्वजनिक क्षेत्र - सीढ़ियां, गलियारे, लॉबी, कॉनफ्रेन्स/सेमिनार कक्ष, प्रतीक्षालय, मनोरंजन कक्ष, पार्किंग, क्लब, तरणताल, ऑफिस.
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2 QUESTION :  सफाई के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें ?
ANSWER:
घर की सफाई के प्रकार घर पर अनेक प्रकार की सफाई की निरन्तर आवश्यकता होती है, परन्तु सभी प्रकार की सफाई व्यस्त जीवन में न तो नित्य सम्भव ही होती है और न ही उसकी नित्य आवश्यकता होती है। अतः भिन्न-भिन्न महत्त्व की सफाई को क्रमश: इन पाँच भागों या पाँच प्रकारों में विभक्त कर लिया जाता है, अर्थात् ⦁     दैनिक सफाई (Daily Cleaning), ⦁    साप्ताहिक सफाई (Weekly Cleaning), ⦁     मासिक सफाई (Monthly Cleaning), ⦁    वार्षिक सफाई (Annual Cleaning) तथा ⦁    आकस्मिक सफाई (Sudden Cleaning) इन पाँचों प्रकार की सफाई का विस्तृत विवरण एवं महत्त्व निम्नवर्णित है (1) दैनिक सफाई—जिस प्रकार नित्य-प्रति भोजन पकाया जाता है तथा शारीरिक सफाई के लिए स्नान किया जाता है, उसी प्रकार घर की कुछ सफाई भी नित्य ही की जाती है। घर की जो सफाई नित्य करनी अनिवार्य होती है, उसका विवरण इस प्रकार है (i) विभिन्न कमरों की दैनिक सफाई–हवा से उड़कर अनेक प्रकार की गन्दगी एवं धूल नित्य ही हमारे कमरों में आती है। इसके अतिरिक्त जूतों के साथ भी मिट्टी आदि कमरे में जाती है। बच्चों वाले घर में भी बच्चे कागज के टुकड़े, पेन्सिल की छीलन आदि गन्दगी बिखेर देते हैं। अत: इन सब गन्दगियो की सफाई नित्य ही होनी अनिवार्य है। इसलिए रोज ही कमरों में झाडू लगाना तथा फर्नीचर को कपड़े से पोंछना व झाड़ना अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। कमरे के फर्श पर पोंछा लगाना भी अच्छा रहता है।   पोंछे के पानी में फिनाइल या किसी अन्य नि:संक्रामक घोल को अवश्य डाल लेना चाहिए। दरवाजे के पास रखे गए पायदान को अवश्य झाड़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त कमरों में अस्त-व्यस्त फैले हुए सामान एवं कपड़ों को भी समेट्ना एवं यथास्थान रखना अनिवार्य है। बिस्तर को ठीक करना तथा यदि आवश्यक हो तो उठाकर निर्धारित स्थान पर रखना चाहिए। यदि धर में फूलदानों में फूल रखे जाते हों तो उनकी भी रोज देखभाल करनी चाहिए। (ii) रसोईघर को साफ करना–रसोईघर या पाकशाला को भी नित्य ही साफ करना अत्यन्त आवश्यक है। रसोईघर में जूठे बर्तन रखे रहते हैं तथा भोजन के कण बिखर जाते हैं। इन सबकी सफाई रोज ही होनी चाहिए। जूठे बर्तन भी रोज ही माँजे जाने चाहिए। रसोईघर को साफ रखना गृहिणी का मुख्य कर्तव्य है। (iii) स्नानगृह एवं शौचालय की सफाई-स्नानगृह एवं शौचालय की सफाई नित्य ही करनी चाहिए। स्नानगृह में साबुन आदि के कारण काफी गन्दगी हो जाती है। स्नानगृह में कपड़े भी धोए जाते हैं जिनकी मैल फर्श पर रुक जाती है; अतः नित्य ही स्नानगृह के फर्श को झाड़ से साफ करना चाहिए। स्नानगृह में इस्तेमाल होने वाली बाल्टी, लोटा आदि भी साफ करके औंधे कर देने चाहिए ताकि उनमें पानी पड़ी न रहे। इसी प्रकार शौचालय की सफाई भी नित्य ही होनी चाहिए। शौचालय में फिनाइल आदि भी अवश्य डालना चाहिए। (iv) घर की नालियों एवं अन्य स्थानों की सफाई-घर के अन्दर बहने वाली नालियों: जैसे- रसोईघर से पानी निकालने वाली नाली आदि; की सफाई नित्य होनी चाहिए। (v) बाहर की सफाई–घर के आन्तरिक भागों के अतिरिक्त घर के बाहरी भागों की सफाई भी आवश्यक होती है। घर के आँगन अथवा लॉन की सफाई अति आवश्यक होती है। यदि दरवाजा बाहर को खुलता हो तो उस दरवाजे तथा उसके आस-पास या सीढ़ी आदि की भी प्रतिदिन सफाई अनिवार्य रूप से की जाती हैं। (2) साप्ताहिक सफाई-घर के सभी स्थानों की सफाई प्रतिदिन की जानी सम्भव नहीं होती; अत: कुछ स्थानों एवं वस्तुओं की सफाई सप्ताह में एक बार ही की जाती हैं। यह सफाई सामान्य रूप से छुट्टी के दिन ही की जाती है। साप्ताहिक सफाई के अन्तर्गत घर की दरियो एवं कालीनों को झाड़ा जाता है। फर्नीचर को भी पूरी तरह झाड़कर उनकी गद्दियों आदि को ठीक किया जाता है। दरवाजों तथा खिड़कियों के पास लग गए मकड़ी आदि के जालों को भी साफ करना चाहिए। कमरे में लटकने वाली तस्वीरों एवं सजावट की अन्य वस्तुओं को भी साप्ताहिक सफाई के दिन साफ करना चाहिए। यदि आवश्यकता समझी जाए तो कमरों के फर्श को भी धोया जा सकता है। घर के बिस्तर एवं चादरो को भी इस दिन धूप में कुछ समय के लिए अवश्य डालना चाहिए। सर्दियों में तो यह अति आवश्यक होता है। यदि पलंग अथवा चारपाइयों में खटमल हों तो इस दिन उन्हें मारने के लिए कोई कीटनाशक दवा अवश्य छिड़कनी चाहिए। साप्ताहिक सफाई के अन्तर्गत रसोईघर में भी कुछ वस्तुओं को विशेष रूप से साफ करना चाहिए। रसोई की वस्तुएँ अर्थात् दाल-मसाले आदि रखने वाले प्लास्टिक के डिब्बों को भी साबुन अथवा सर्फ से धो और मुखाकर यथास्थान रख देना चाहिए। इसी दिन स्नानगृह में लगी वाश-बेसिन एवं अन्य वस्तुओं को भी विशेष रूप से साफ करना चाहिए और घर के मैले कपड़े एवं चादरें आदि भी गिनकर धोबी के पास भेज देने चाहिए। संक्षेप में कहा जा सकता है कि साप्ताहिक सफाई के अन्तर्गत घर के सभी स्थानों की कुछ अधिक मेहनत से सफाई की जाती है। (3) मासिक सफाई--कुछ वस्तुएँ एवं स्थान ऐसे होते हैं जिनकी सफाई साप्ताहिक सफाई में भी नहीं हो पाती तथा यह सफाई हर सप्ताह आवश्यक भी नहीं होती। ऐसी सफाई महीने में एक बार अवश्य हो जानी चाहिए। इसलिए इस सफाई को मासिक सफाई कहा जाता है। मासिक सफाई के अन्तर्गत मुख्य रूप से भण्डार-गृह अथवा स्टोर-रूम की सफाई आती है। भण्डार-गृह में रखी सभी वस्तुओं को झाड़-पोंछकर साफ किया जाता है तथा उन्हें धूप में रखा जाता है। इसी प्रकार रसोईघर में रखी हुई वस्तुओं को भी महीने में एक बार अवश्य धूप में रखना चाहिए। इससे दाल-चावल आदि खाद्यान्नों में घुन या कीड़ा नहीं लगने पाता। अचार, चटनी आदि को भी महीने में एक बार धूप में रखना अच्छा होता है। मासिक सफाई का भी विशेष महत्त्व होता है। | (4) वार्षिक सफाई–दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक सफाई के अतिरिक्त वार्षिक सफाई भी अपना विशेष महत्त्व रखती है। वार्षिक सफाई, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, वर्ष में केवल एक ही बार की जाती है। हमारे देश में इस प्रकार की सफाई करने की परम्परा दीपावली के अवसर पर होती है। दीपावली सामान्य रूप से वर्षा के बाद सर्दियों के प्रारम्भ में होती है। इस अवसर पर घर की पूर्ण सफाई करना या करवाना नितान्त आवश्यक होता है। वार्षिक सफाई के समय सम्पूर्ण घर की विस्तृत रूप से सफाई की जाती है। इस सफाई के अन्तर्गत घर के समस्त सामान को बाहर निकाला जाता है तथा उसे झाड़-पोंछकर एवं साफ करके रखा जाता है। इसी अवसर पर घर की पुताई भी करवाई जाती है। पुताई के साथ-साथ छोटी-छोटी टूट-फूट की मरम्मत भी करवा ली जाती है। दरवाजों एवं खिड़कियों पर रंग-रोगन तथा फर्नीचर पर पॉलिश भी करवाई जाती है। वार्षिक सफाई के अवसर पर घर के सामान को छाँटा भी जाता है। फालतू एवं व्यर्थ के सामान को या तो फेंक दिया जाता है अथवा कबाड़ी को बेच दिया जाता है। (5) आकस्मिक सफाई-घर की सफाई के उपर्युक्त चार नियमित प्रकारों के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार का भी विशेष महत्त्व है। घरेलू सफाई के इस प्रकार को आकस्मिक सफाई कहा जाता है। घरेलू सफाई के इस प्रकार का कोई निर्धारित समय नहीं होता तथा कभी भी इस प्रकार की सफाई की आवश्यकता हो सकती है। उदाहरण के लिए-तेज धूल भरी आँधी आ जाने की स्थिति में घर की विस्तृत सफाई अति आवश्यक हो जाती है, भले ही उसके पूर्व साप्ताहिक या मासिक सफाई ही क्यों न की गई हो। ..........................................................

Question 3:  वस्त्रों की धुलाई से आप क्या समझते हैं? वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता भी स्पष्ट कीजिए।

ANSWER

वस्त्रों की धुलाई का अर्थ सभ्य मनुष्य के जीवन में वस्त्रों का अत्यन्त महत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति समय-समय पर जो वस्त्र धारण करता है, उन वस्त्रों से जहाँ एक ओर उसके शरीर को विभिन्न प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होती है, वहीं दूसरी ओर वे वस्त्र व्यक्ति के व्यक्तित्व को (UPBoardSolutions.com) निखारने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल साफ-सुथरे तथा धुले हुए वस्त्र ही उत्तम माने जाते हैं।

नियमित रूप से धारण किए जाने वाले तथा घर पर अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्र शीघ्र ही गन्दे एवं मैले हो जाते हैं। वस्त्रों के गन्दे एवं मैले होने में जहाँ बाहरी धूल-मिट्टी एवं गन्दगी की विशेष भूमिका होती है, वहीं वस्त्रों को धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले पसीने का भी विशेष प्रभाव होता है। पसीने से गीले हुए वस्त्रों में बाहरी धूल-मिट्टी जम जाती है। यही नहीं पसीना वस्त्रों में ही सूखकर उन्हें दुर्गन्धयुक्त भी बनाता है। इस प्रकार विभिन्न कारणों से गन्दे एवं मैले हुए वस्त्रों को पुनः गन्दगी एवं दुर्गन्धरहित साफ-सुथरा बनाने की प्रक्रिया को ही वस्त्रों की धुलाई कहते हैं। वस्त्रों की धुलाई के अन्तर्गत विभिन्न साधनों एवं उपायों द्वारा वस्त्रों की मैल, गन्दगी, दुर्गन्ध
आदि को समाप्त किया जाता है तथा पुनः वस्त्रों को साफ-सुथरा बनाया जाता है। वस्त्रों की धुलाई के लिए जल तथा शोधक पदार्थ (साबुन, डिटर्जेण्ट आदि) आवश्यक होते हैं तथा इसके लिए वस्त्रों को मलना, रगड़ना, पीटना एवं खंगालना आदि आवश्यक उपाय होते है

वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता

प्रश्न उठता है कि वस्त्रों को धुलाई की आवश्यकता क्यों होती है? या यह कहा जाए कि वस्त्रों की धुलाई का उद्देश्य क्या होता है? इस विषय में निम्नलिखित तथ्यों को जानना अभीष्ट होगा

(1) वस्त्रों की सफाई के लिए:
शरीर की नियमित सफाई जिस प्रकार अति आवश्यक होती है, ठीक उसी प्रकार शरीर पर धारण करने वाले तथा अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्रों की भी नियमित सफाई आवश्यक होती है। शारीरिक सफाई के लिए स्नान आवश्यक होता है तथा की सफाई के लिए वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना 

2) वस्त्रों की दुर्गन्ध समाप्त करने के लिए:

कपड़ों को पहनने, बिछाने तथा ओढ़ने आदि के दौरान शरीर से निकलने वाला पसीना उनमें व्याप्त हो जाता है। इस पसीने से वस्त्रों में दुर्गन्ध आ जाती है। इस दुर्गन्ध को समाप्त करने के लिए भी वस्त्रों की धुलाई आवश्यक हो जाती है।

(3) कपड़ों की सुरक्षा के लिए:
कपड़ों की सुरक्षा के लिए भी इनकी नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है। गन्दे एवं मैले वस्त्रों को विभिन्न प्रकार के कीड़ों, फफूदी तथा बैक्टीरिया आदि द्वारा नष्ट कर देने की आशंका बनी रहती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए वस्त्रों की सुरक्षा के लिए भी वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(4) व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए:
मैले एवं गन्दे वस्त्र व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। मैले एवं गन्दे वस्त्र निरन्तर धारण किए रहने की स्थिति में विभिन्न चर्म रोग हो जाने की आशंका रहती है। यही नहीं गन्दे वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव (UPBoardSolutions.com) पड़ सकता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः हीन-भावना का शिकार हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्तिगत, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को रम्नाए रखने के लिए भी वस्त्रों की नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है।

5) कपड़ों की सुन्दरता के लिए:

गन्दे एवं मैले वस्त्र भद्दे एवं बुरे लगते हैं। वस्त्रों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने के लिए उनकी नियमित धुलाई आवश्यक होती है।

(6) व्यक्तित्व के निखार के लिए:
नि:सन्देह कहा जा सकता है कि साफ-सुथरे एवं धुले हुए तथा अच्छी तरह से प्रेस किए हुए वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भी वस्त्रों

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QUESTION 4 :  वातावरण स्वच्छता  को प्रभावित करने वाले कौन कौन से कारक हैं  और कैसे प्रभावित करते हैं?
ANSWER:   व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्गीकरण, शरीर के विभिन्न अंगों की कार्य- प्रणाली में उत्पन्न किसी दोष के कारण भी रोग उत्पन्न हो सकते हैं व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले मुख्य दो ही कारक हैं-
1. आंतरिक कारक-शरीर के किसी भी अंग की कार्य-प्रणाली में उत्पन्न दोष या कुसंक्रिया, हार्मोन का या प्रतिरक्षण संस्थान का ठीक प्रकार से कार्य नहीं करना आदि आंतरिक कारक हैं। चिकित्सा द्वारा आंतरिक कारकों का उपचार किया जा सकता है। इस प्रकार के उत्पन्न रोगों को जैविक या. उपापचयी रोग कहते हैं।
2. बाह्य कारक-अपर्याप्त आहार, रोग डत्पन्न करने वाले सूक्ष्म जीव, पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले प्रदूषक पदार्थ बाह्य कारक हैं जो हमारे शरीर के कार्यों में हस्तक्षेप करके हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं इनका उपचार पूर्ण भौजन, स्वच्छ पर्यावरण तथा ऐसी सामाजिक परंपराएं जो अच्छी और ठीक आदतों को बढ़ावा देती हैं। आपातकालीन विपत्तियां जैसे लू लगना, ठंड में तुषार, उपघात आदि भी बाह्य कारकों में ही आती हैं।
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक-
(a) पोषण-कुपोषण से अनेक रोग जन्म लेते हैं तथा कुपोषण ग़रीबी का परिणाम है। पोषण से ही मानव शरीर को प्रतिरक्षण प्राप्त होता है जो रोगों से लड़ने क्षमता प्रदान करता है। आवशस्यकता से अधिक आहार लेने पर मोटापा हो जाता है जो आगे कई रोगों का कारण बनता है। नियंत्रित भोजन, व्यायाम तथा चिकित्सा से इस रोग का निवारण किया जा सकता है। हमारा भोजन सरल, स्वच्छ तथा संतुलित होना चाहिए।
(b) सूक्ष्म जीवों दवारा संक्रमण-सूक्ष्म जीव संक्रमण का प्रमुख कारण है। सूक्ष्म जीव हमारे शरीर में सांस दुवारा, भोजन और पानी दुबारा, त्वचीय स्पर्श के दुवारा या घाव तथा मच्छर-मक्खी आदि वाहकों के द्वारा शरीर में प्रवेश करते हैं। कुछ सूक्ष्म जीवों का संक्रमण सरलता से हो जाता है। कुछ का प्रभाव लंबे समय के पश्चात् पता चलता है जीवाणु, फंगस, विषाणु तथा प्रोटोजोआ ऐसे सूक्ष्म जीव हैं जिनका संक्रमण घातक होता है। इनके संक्रमण से न्यूमोनिया, टिटनेस, क्षव रोग, कुष्ठ रोग, हैजा, चर्म रोग, चेचक, खसरा, कैंसर, एड्स, रेबीज, डेंगू. मलेरिया, काला ज्वर, पेचिश, गिआर्डियता तथा विषाक्त भोजन जैसे रोग होते हैं। सूक्ष्म जीबों दुवारा संक्रमण से बचने का सामान्य उपाय है वातावरण को स्वच्छ बनाए रखना तथा इन रोगों से लड़ने के लिए शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षी व्यवस्था को बनाए रखना।

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 QUESTION 5:  प्राथमिक उपचार क्या है ,  प्राथमिक उपचार में अवश्य  बातें कौन-कौन सी है ?
ANSWER
किसी रोग के होने या चोट लगने पर किसी अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा जो सीमित उपचार किया जाता है उसे प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) कहते हैं। इसका उद्देश्य कम से कम साधनों में इतनी व्यवस्था करना होता है कि चोटग्रस्त व्यक्ति को सम्यक इलाज कराने की स्थिति में लाने में लगने वाले समय में कम से कम नुकसान हो। अतः प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षित या अप्रशिक्षित व्यक्तिओं द्वारा कम से कम साधनों में किया गया सरल उपचार है। कभी-कभी यह जीवन रक्षक भी सिद्ध होता है।
प्राथमिक चिकित्सा विद्या प्रयोगात्मक चिकित्सा के मूल सिद्धांतों पर निर्भर है। इसका ज्ञान शिक्षित पुरुषों को इस योग्य बनाता है कि वे आकस्मिक दुर्घटना या बीमारी के अवसर पर, चिकित्सक के आने तक या रोगी को सुरक्षित स्थान पर ले जाने तक, उसके जीवन को बचाने, रोगनिवृत्ति में सहायक होने, या घाव की दशा और अधिक निकृष्ट होने से रोकने में उपयुक्त सहायता कर सकें।
प्राथमिक उपचार में आवश्यक बातें
  • प्राथमिक उपचारक को आवश्यकतानुसार रोगनिदान करना चाहिए, तथा
  • घायल को कितनी, कैसी और कहाँ तक सहायता दी जाए, इसपर विचार करना चाहिए।
रोग या घाव संबंधी आवश्यक बातें
  • रोगी की स्थिति, इसमें रोगी की दशा और स्थिति देखनी चाहिए।
  • चिन्ह, लक्षण या वृत्तांत, अर्थात् घायल के शरीरगत चिन्ह, जैसे सूजन, कुरूपता, रक्तसंचय इतयादि प्राथमिक उपचारक को अपनी ज्ञानेंद्रियों से पहचानना तथा लक्षण, जैसे पीड़ा, जड़ता, घुमरी, प्यास इत्यादि, पर ध्यान देना चाहिए। यदि घायल व्यक्ति होश में हो तो रोग का और वृत्तांत उससे, या आसपास के लोगों से, पूछना चाहिए। रोगके वृत्तांत के साथ लक्षणों पर विचार करने पर निदान में बड़ी सहायता मिलती है।
  • कारण : यदि कारण का बोध हो जाए तो उसके फल का बहुत कुछ बोध हो सकता है, परंतु स्मरण रहे कि एक कारण से दो स्थानों पर चोट, अर्थात् दो फल हो सकते हैं, अथवा एक कारण से या तो स्पष्ट फल हो, या कोई दूसरा फल, जिसका संबंध उस कारण से न हो, हो सकता है। कभी कभी कारण बाद तक अपना काम करता रहता है, जैसे गले में फंदा इत्यादि।
घटनास्थल से संबंधित बातें -
  • खतरे का मूल कारण, आग, बिजली का तार, विषैली गैस, केले का छिलका या बिगड़ा घोड़ा इत्यादि हो सकते हैं, जिसका ज्ञान प्राथमिक उपचारक को प्राप्त करना चाहिए।
  • निदान में सहायक बातें, जैसे रक्त के धब्बे, टूटी सीढ़ी, बोतलें तथा ऐसी वस्तुओं को, जिनसे घायल की चोट या रोग से संबंध हो सुरक्षित रखना चाहिए।
  • घटनास्थल पर उपलब्ध वस्तुओं का यथोचित उपयोग करना श्रेयस्कर है।
  • दोहर, कंबल, छाते इत्यादि से बीमार की धूप या बरसात से रक्षा करनी चाहिए।
  • बीमार को ले जाने के निमित्त प्राथमिक उपचारक को देखना चाहिए कि घटनास्थान पर क्या क्या वस्तुएँ मिल सकती हैं। छाया का स्थान कितनी दूर है, मार्ग की दशा क्या है। रोगी को ले जाने के लिए प्राप्त योग्य सहायता का श्रेष्ठ उपयोग तथा रोगी की पूरी देखभाल करनी चाहिए।
प्राथमिक उपचार करनेवाले व्यक्ति के गुण
  • (१) विवेकी (observant), जिससे वह दुर्घटना के चिन्ह पहचान सके;
  • (२) व्यवहारकुशल (tactful), जिससे घटना संबंधी जानकारी जल्द से जल्द प्राप्त करते हुए वह रोगी का विश्वास प्राप्त करे;
  • (३) युक्तिपूर्ण (resourceful), जिससे वह निकटतम साधनों का उपयोग कर प्रकृति का सहायक बने;
  • (४) निपुण (dexterous), जिससे वह ऐसे उपायों को काम में लाए कि रोगी को उठाने इत्यादि में कष्ट न हो;
  • (५) स्पष्टवक्ता (explicit), जिससे वह लोगों की सहायता में ठीक अगुवाई कर सके;
  • (६) विवेचक (discriminator), जिससे गंभीर एवं घातक चोटों को पहचान कर उनका उपचार पहले करे;
  • (७) अध्यवसायी (persevering), जिससे तत्काल सफलता न मिलने पर भी निराश न हो तथा
  • (८) सहानुभूतियुक्त (sympathetic), जिससे रोगी को ढाढ़स दे सके, होना चाहिए।


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Question 6 : 

घरेलू बजट का क्या महत्व है परिवार के लिए बजट समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिय।

ANSWER :

समझकर कर सकता है क्योंकि धन एक सिमित साधन है तथा यह प्रशास करता है की अपनी सिमित आय द्वारा अपने परिवार की समस्त आवश्यकताओं को पूर्ण करके भविष्य हेतु कुछ न कुछ बचत के सकें। यही कारण है की गृहस्वामी तथा गृहस्वामिनी सोच समझ करके अपने परिवार की आय का उचित व्यय करने हेतु लिखित एवं मौखिक योजना बनाते हगैं और उस योजना को  क्रियान्वित करने के लिए उन्हें अपने व्यय का पूरा हिसाब किताब रखना पड़ता है, कोई भी परिवार घरेलु बचत बनाकर ही व्यय को नियत्रित कर सकता है।

  • घरेलु बचत के निम्नलिखित लाभ हैं :
  1. घरेलु हिसाब किताब प्रतिदिन लिखने से हमें यह ज्ञात रहता है की हमारे पास कितना पैसा शेष बचा है जो परिवार की आवश्यकतों की पूर्ति हेतु अत्यन्त आवश्यक है जिससे -पारिवारिक लक्ष्य की प्राप्ति जो सके।
  2. घरेलु किताब रखने से अधिक व्यय पर अंकुश रहता है। विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एक सामान्य दिशा निर्देश का आभास होता है।
  3. असीमित आवश्यकतओं  और सिमित आय के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है।
  4. सही ढ़ग से व्यय करने के फलस्वरूप बचत व णिव्वेष को प्रोत्साहन मिलता है।
  5. इससे परिवार का भविष्य सुरक्षित रहता है।
  • परिवार के लिए वजट बनते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना चाहिए।
  1. आय और व्यय के बीच ज्यादा फासला न हो अर्थात आय की तुलना में व्यय बहुत अधिक नहीं हो।
  2. बजट से जीवन लक्ष्यों की पूर्ति हो यानी परिवार को उच्च जीवन स्तर की औ प्रेरित कर सकें।
  3. बजट बनाते समय अनिवार्य आवश्यकतओं को ध्यान में रखना चाहिए।
  4. सुरक्षति भविष्य का ध्यान माइए रखकर बजट बनानी चाहिए ताकि आकस्मिक खर्चों यथा बिमारी, दुर्घटना तथा विवाह आदि के लिए धन की आवश्यकत की पूर्ति समय पर हो सके।
  5. व्यव को आए के साथ समायोजित होना चाहिए ताकि ऋण का सहारा न लेना पड़े।
  6. बजट बनते समय महंगाई को भी ध्यान माइए रखना चाहिए।




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Do direct 10th 12th
Distance / open education BA MA BCOM MCOM BSC MSC BBA MBA 
Granted pass
GGSVM INSTITUTE AHMEDGARH
8837894477

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